200+ कबीर दास के दोहे इन हिंदी – Kabir Das Ke Dohe

Kabir Das Ke Dohe: ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए। औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय।। ऐसी अनेकों दोहे जो कबीर दास जी ने हमें सिखाएं हैं आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे। दोस्तों, कबीर दास एक महान कवि और संत थे जिनका जन्म 15 शताब्दी में सावत 1455 में “राम तारा काशी” में हुआ था। उनकी गुरु का नाम संत “आचार्य रामानंद” जी था। कबीर दास जी की पत्नी का नाम “लोई” था। कबीर दास जी हिंदी साहित्य की निर्गुण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। उनकी पुत्र का नाम “कमाल” और पुत्री का नाम “कमाली” था। कबीर दास जी की वाणी को साखी, संबंध और रमैनी तीनों रूपों में लिखा गया है। कबीर दास बेहद यानी थे और स्कूली शिक्षा ना प्राप्त होने पर भी उन्हे भोजपुरी, हिंदी, अवधी, जैसे अलग-अलग भाषाओं में उनकी काफी अच्छी पकड़ थी। कबीर दास जी ईश्वर को मानते थे और किसी भी प्रकार के कर्मकांड का विरोध करते थे। आज हम आपको इस आर्टिकल में कबीर जी के प्रसिद्ध दोहों को बताएंगे जो आपकी जीवन को एक नई सीख देते हैं और जिनका पालन करने से आपका जीवन सुखमय प्रतित होता है।

Kabir Das ke Dohe

Kabir Das ke Dohe
Kabir Das ke Dohe
कबीर दास के दोहे की लिस्ट हमने नीचे दी हुई है:
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।
“लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!”
“पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”
“जो तूं ब्राह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !! ”

Kabir Das ke Dohe

“माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया ! जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया !!”
माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।
ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग । तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।।

कबीर दास के दोहे

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए । यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ।।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय । बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो मिलाय ।।
सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज । सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।।

कबीर दास के दोहे

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।।
ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।।
बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय । जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।।
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।।
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Kabir Das ke Dohe in Hindi

Kabir Das ke Dohe
Kabir Das ke Dohe
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ।।
मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार । फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।।
जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान ।।
तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ।।

Kabir Das ke Dohe in Hindi

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए । मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।।
कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी । एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।

कबीर दास के दोहे इन हिंदी

जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ॥

मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि ॥

उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं ॥

कबीर दास के दोहे इन हिंदी

कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ । इत के भये न उत के, चाले मूल गंवाइ ॥

`कबीर’ नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ ॥

पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार। याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार।।

Kabir Ke Dohe

“लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!”

“पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”

“जो तूं ब्राह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !! ”

कबीर के दोहे

“माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया ! जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया !!”

कबीर की उलटवासियाँ  Kabir Ke Dohe

कबीर की उलटबांसी रचनाओं का अर्थ कबीर की उन रचनाओं से है, जिनके माध्यम से कबीर ने अपनी बात को मोड़कर और प्रचलित अर्थ से एकदम विपरीत अर्थ में अपनी बात कही है। कबीर का उल्टा समझना हर किसी के लिए आसान नहीं होता है, क्योंकि इन रचनाओं के माध्यम से कबीर ने अपनी बात को कई ट्विस्ट एंड टर्न्स में कहा है, जिससे पाठक इसके प्रचलित अर्थ में उलझा रहता है, जबकि कबीर का अर्थ उसका अर्थ होता है। विपरीत का अर्थ है विपरीत कहना। इसलिए इन रचनाओं को ‘उल्टाबंसी’ कहा जाता है।
उदाहरन के तौर पर:
देखि-देखि जिय अचरज होई
यह पद बूझें बिरला कोई
धरती उलटि अकासै जाय,
चिउंटी के मुख हस्ति समाय
बिना पवन सो पर्वत उड़े,
जीव जन्तु सब वृक्षा चढ़े
सूखे-सरवर उठे हिलोरा,
बिनु-जल चकवा करत किलोरा।

अर्थात पृथ्वी आकाश की ओर मुड़ गई, हाथी चींटी के मुंह में फंस गया, पर्वत बिना हवा के उड़ने लगा, सभी जीव सभी पेड़ों पर चढ़ने लगे। सूखी सरोवर में काँपने लगा और चकवा बिना पानी के गुर्राने लगा। कबीर ने इस उलटी बंसी के माध्यम से एक योगी की आंतरिक और बाहरी स्थिति का वर्णन किया है। अर्थात जब संत-योगी जागते हैं तो संसार सोता है, जब संत-योगी सोता है, संसार जागता है। कबीर कहने का तात्पर्य यह है कि इस भौतिक संसार के कर्म और व्यवहार आध्यात्मिक जीवन में पूरी तरह उलट हैं। अर्थात पृथ्वी आकाश बन जाती है, हाथी के मुंह में चींटी की जगह हाथी चींटी के मुंह में चला जाता है, हवा में उड़ने वाला पहाड़ बिना हवा के उड़ने लगता है, जमीन पर चलने वाले जानवर पेड़ बन जाते हैं . चढ़ना शुरू करो, भले ही पानी सरोवर में ही हिलता-डुलता है, लेकिन यहां सूखी झील में ऊपर उठने लगता है और पानी को देखकर बड़बड़ाने वाला चकवा बिना पानी के गुर्राने लगता है यानी सारा काम उल्टा होने लगता है।

अंतिम शब्द

हमने आपको ऊपर कबीर दास के दोहे की लिस्ट बताई है। दोस्तों, Kabir Das Ke Dohe भले ही पढ़ने में या सुनने में अलग हो लेकिन इनका मतलब हमेशा ही काफी महत्वपूर्ण और अलग होता है जिसे सिर्फ थोड़ा घुमा फिरा कर कहा गया है.

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